Feb. 8, 2022

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न -48

प्रश्न- भारतीय इतिहास में सल्तनत काल चित्रकारिता का'अंधकार युग' है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? 

उत्तर: भारतीय इतिहास में अब तक  सल्तनत काल को  चित्रकारिता के अंधकार युग  के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है, परंतु सबसे पहले हरमन गोट्ज़ द्वारा  प्रकाशित 'जर्नल ऑफ दि  इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट' में प्रकाशित एक लेख में इस तथ्य पर प्रकाश डाला गया है कि सल्तनत काल के दौरान, चित्रकला, विशेष रूप से भित्ति चित्रों के निर्माण की शैली न केवल ज्ञात  थी बल्कि राजदरबारों में इसका व्यापक रूप से उपयोग भी किया जाता था। आगे मुहम्मद अब्दुल्ला चगताई, साइमन डिग्बी, कार्ल खंडालावाला और मोती चंद द्वारा अलग-अलग समय पर प्रस्तुत शोधों ने उपरोक्त तथ्य की पुष्टि की।

                 सल्तनत काल में चित्रकला के प्रचलन संबंधित सबसे प्रारंभिक उल्लेख   अबुल-फल बैहाकी द्वारा लिखित पुस्तक 'गजनवियों के इतिहास' (तारिख ए बैहाकी) में है। इस ग्रंथ में सुल्तान महमूद की राजधानी हेरात और लश्करी बाजार नामक नगर की इमारतों और स्मारकों का उल्लेख है। पुरातत्वविदों ने लश्करी बाजार की दीवारों का पता लगाया है, जिस पर शाही पोशाक पहने शाही गुलामों को चित्रित करने वाले भित्ति चित्रों के अवशेष पाए गए थे। सुल्तान महमूद के दरबारी कवि फारूकी ने भी लाहौर में महमूद द्वारा निर्मित भव्य उद्यान में निगारनामा (पेंटिंग गैलरी) की उपस्थिति की गवाही दी।

एक समकालीन लेखक ताजुद्दीन रजा के अनुसार, इल्तुतमिश ने कलात्मक गतिविधियों को संरक्षण दिया और उसके शासनकाल के दौरान सजावटी पेंटिंग प्रचलित थीं। 14वीं सदी के लेखक इसामी ने अपनी पुस्तक ('फ़ुतुह-उस-सलातिन')मे चित्रकला के संदर्भ में रज़ा के साक्ष्यों की पुष्टि करते हैं। इसामी का मानना ​​है कि इल्तुतमिश के शासनकाल में चीनी चित्रकारों को दरबार की सजावट के लिए लाया गया था।

                 समकालीन फ़ारसी और हिंदी ग्रंथों में, भित्ति चित्रों, पांडुलिपि चित्रों के साथ-साथ कपड़ों पर बने चित्रो  का भी उल्लेख किया गया है। आमिर खुसरो की प्रसिद्ध पुस्तक 'आशिका' में चित्रो के डिजाइन के लिए चरकबो अर्थात छेददार झावों के उपयोग का उल्लेख है। खुसरो के ही अन्य ग्रंथ 'नूह सिपिहर' में सुन्दर रूप से चित्रित वस्त्रों का उल्लेख है।

               सल्तनत काल के दौरान चित्रकला पर सबसे महत्वपूर्ण विवरण अफिफ की कृति 'तारीख-ए-फिरोजशाही' से प्राप्त होता हैं। इस ग्रंथ में अफीम द्वारा फिरोज शाह के गैर इस्लामी प्रयासों के प्रति अपनाए जाने वाले रवैया की चर्चा करते हुए बतलाया गया है कि फिरोज शाह ने अन्य सुल्तानों द्वारा आराम ग्रहों में आकृति मूलक चित्रों से सजावट जाने की प्रथा को गैर इस्लामी मानते हुए बंद कर दिया था ,फिरोज ने आदेश दिया कि जीवित आकृतियों के चित्रों को चित्रकला गैलरी में नहीं लगाया जाना  चाहिए। सुल्तान फिरोज शाह ने मनुष्य के चित्रण के स्थान पर  पुष्पित वृक्षों  के रेखांकन को अधिक महत्व दिया।

सल्तनत काल में शाही दरबार के बाहर चित्रकला की परंपरा के प्रमाण मिलते हैं।  मौलाना दाऊद द्वारा रचित  हिंदी कविता चंदायन  में घर में रंगीन सज्जापूर्ण ऊपरी कक्षों का वर्णन है इस कविता की 15 वीं शताब्दी में  चित्रित एक पांडुलिपि के एक चित्र में हेरोइन चंदा के शयनकक्ष को दर्शाया गया है, जिसकी दीवारों पर  रामायण के दृश्यों का चित्रांकन किया गया हैं। इसी प्रकार    , कुतुवन द्वारा लिखित 16वीं शताब्दी की रोमांटिक कविता 'मृगायन' में,  शयन कक्ष को  रामायण के दृश्यों  से  चित्रित दिखाया गया है।

               दिल्ली सल्तनत की स्थापना से पूर्व लघु चित्रकला का विकास हुआ दिखता है यह चित्रकला ताड़पत्र, लकड़ी की पट्टियों आदि पर  निर्मित होती थी । आगे भारत में विशेषकर पश्चिमी भारत लघुचित्रों का केंद्र बना, जहाँ इसे उदार संरक्षण दिया गया। यह शैली 14वीं और 15वीं शताब्दी में एक शक्तिशाली आंदोलन के रूप में विकसित हुई।  बाद में यह कला मध्य, उत्तरी और यहां तक ​​कि पूर्वी भारत में भी फैल गई। सल्तनत काल में, दिल्ली सल्तनत की तुलना में लघु शैली पर मांडू, जौनपुर, बंगाल और गुजरात जैसे प्रांतीय राज्य का अधिक प्रभाव देखा जा सकता है।

                 कुल मिलाकर सल्तनत काल में चित्रकला के अनेक अप्रत्यक्ष साहित्यिक साक्ष्य मिलते हैं। हालाँकि, इन चित्रों को एकत्र नहीं किया जा सका क्योंकि चित्रकला बनाने और नष्ट करने की प्रक्रिया तेज थी,आखिरकार, यह राजनीतिक अशांति और युद्ध का दौर था। पूरे सल्तनत काल के दौरान, कोई एक शासक इतनी लंबी शांतिपूर्ण अवधि के लिए सिंहासन पर नहीं बैठ सका  कि वह एक बेहतर धर्मनिरपेक्ष स्थापत्य का ही निर्माण कर सके जिसमें चित्रण कार्य को स्थान दिया जा सके । सल्तनत काल के समस्त भवन मुख्य रूप से मस्जिदें, मकबरे आदि के रूप में निर्मित हुए जिनमें इस्लामी प्रतिबद्धता के चलते भित्ति  चित्रण को स्थान दिलाना असंभव था ।